एम्स ऋषिकेश में कार्डियो डायबेटिक सोसाइटी (सीडीएस) के वार्षिक सम्मेलन के अंतिम दिन विशेषज्ञों ने कहा कि ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच से मधुमेह और हृदय संबन्धित समस्याओं का समय पर पता लगाया जा सकता है। इस दौरान विशेषज्ञ चिकित्सकों ने मोटापे की देखभाल और डायबिटीज से होने वाली बीमारियों पर भी मंथन किया।

अंतिम दिन के सम्मेलन में विशेषज्ञ चिकित्सकों के माध्यम से शोध प्रस्तुतियों के बाद तीन सत्र आयोजित किए गए। देशभर के विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों और मेडिकल काॅलेजों से पंहुचे चिकित्सकों ने पहले सत्र में क्रिटिकल केयर पर व्यापक चर्चा की। इस सत्र में उपचार के दौरान रोगी को लगाए गए वेंटिलेटर सपोर्ट से हटने में कठिनाई वाले मरीजों, गंभीर फंगल संक्रमण की जल्दी पहचान, सेप्सिस और एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीवाणुओं की बढ़ती समस्या जैसे विषयों पर मंथन व चर्चा की गयी। विशेषज्ञों ने इसे समाज के लिए चिंता का विषय बताया। सम्मेलन के दूसरे सत्र में चिकित्सकों द्वारा आपसी अनुभवों को साझा करते हुए हृदय और गुर्दे के आपसी संबंध, हृदय विफलता के उपचार, प्रत्यारोपण वाले मधुमेह रोगियों की देखभाल आदि विषयों पर चर्चा की गयी। जबकि तीसरा सत्र मोटापे को दीर्घकालिक रोग के रूप में समझने और उसकी नई पीढ़ी की दवाओं पर केंद्रित था।
सम्मेलन के आयोजन अध्यक्ष व एम्स ऋषिकेश के मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. रविकांत ने कहा कि डायबिटीज की समस्या विश्व में स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह सीधे तौर पर या अंगों के फेल होने पर अप्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि इसका संबंध कई तरह के कैंसर से भी जुड़ा है और डायबिटीज किसी भी अन्य बीमारी के असर को भी प्रभावित कर सकती है। सम्मेलन को कई अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों ने भी संबोधित किया। इस दौरान पोस्टर और मौखिक शोध पत्र प्रस्तुतियों के विजेता भी घोषित किए गए। जिसमें डॉ. तहजीन, डॉ. सिद्धांत, डॉ. अभिजीत, डॉ. कोमल, डॉ. गगन, डॉ. संगप्पा, डॉ. परिधि और डॉ. खुशबू विजेता रहे। जबकि पीजी क्विज में डॉ. गगन दलाल और डॉ. देवांग अग्रवाल की टीम विजेता रही। डॉ. प्रदीप राउत और डॉ. गगन हरनाथ को उपविजेता घोषित किया गया। सम्मेलन में मेडिसिन विभाग के डाॅ. वेंकटेश पाई, डॉ. मुकेश बैरवा, डॉ. पी.के. पांडा, डॉ. दरब सिंह और डॉ. अखिलेश कुमार सहित कई विशेषज्ञ और फैकल्टी सदस्य मौजूद रहे।

इंसेट-
सम्मेलन में पहला सत्र गहन चिकित्सा पर केंद्रित रहा। जिसमें डॉ. अर्नब चैधरी, डॉ. विनय पंडित, डॉ. सुलेखा सक्सेना, डॉ. सीमा महंत और डॉ. एल.एच घोटेकर ने व्याख्यान दिया। हृदय, किडनी और मेटाबॉलिज्म पर आधारित सत्र में डॉ. ज्योति प्रकाश ने जोखिम वाले मरीजों के लिए एंटीमाइक्रोबियल दवाएं चुनते समय किडनी को बचाने की बात की। डॉ. साबू ऑगस्टीन ने हृदय-किडनी-मेटाबॉलिक (सीकेएम) सिंड्रोम पर चर्चा की और कहा कि भारतीय मरीजों के लिए जोखिम और देखभाल को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। डॉ. डी. एम. भौमिक ने किडनी प्रत्यारोपण करा चुके मधुमेह मरीजों में तीव्र रिजेक्शन के प्रबंधन को समझाया। अगला सत्र इस बहस से शुरू हुआ कि क्या रोजाना ली जाने वाली बेसल इंसुलिन अप्रचलित हो रही है।

डॉ. रणविजय सिंह ने प्रस्ताव के पक्ष में और डॉ. अमनदीप कौर ने विपक्ष में तर्क रखे। डॉ. अनिरुद्ध मुखर्जी ने सवाल उठाया कि बुजुर्गों में शुगर पर कितना नियंत्रण पर्याप्त है। डॉ. तनुज भाटिया ने हार्ट फेल्योर के दिशा निर्देशों को मरीज के बिस्तर तक पहुंचाने और सलाह व रोजमर्रा के इलाज के बीच की दूरी घटाने पर बात की, जबकि डॉ. संदीप सूरी ने शुगर से आगे जाकर समग्र नियंत्रण के लिए ट्रिपल मैकेनिज्म थेरेपी पर चर्चा की। सम्मेलन का अंतिम वैज्ञानिक सत्र मोटापे पर केन्द्रित था। डॉ. अमन रोहतगी ने मोटापे को दीर्घकालिक बीमारी मानने और बॉडी मास इंडेक्स से आगे देखने की बात रखी। डॉ. अजय कुमार गुप्ता ने शरीर की चर्बी से कई अंगों को होने वाले नुकसान की खामोश प्रगति को बताया। डॉ. नरेश डांग ने मोटापे के इलाज में इंक्रेटिन दवाओं के एकल से दोहरे असर की ओर बढ़ने को समझाया। डॉ. अशोक कुमार झिंगन ने अपने व्याख्यान और समापन टिप्पणी में सभी साक्ष्यों को एक साथ जोड़ा।




















