बिना शंकराचार्य की अनुमति संन्यास अमान्य: हरिद्वार शास्त्रार्थ में विद्वानों का बड़ा मत, महाकुंभ-अर्धकुंभ को लेकर

बिना शंकराचार्य की अनुमति संन्यास अमान्य: हरिद्वार शास्त्रार्थ में विद्वानों का बड़ा मत, महाकुंभ-अर्धकुंभ को लेकर शास्त्रीय मंथन, संत परंपरा की मर्यादा पर जोर

धर्मनगरी हरिद्वार के शांभवी पीठ में गुरुवार को महाकुंभ, अर्धकुंभ एवं अखाड़ा परिषद से जुड़े विषयों पर एक महत्वपूर्ण शास्त्रार्थ चर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने की, जिसमें देशभर से आए विद्वानों ने भाग लिया।
शास्त्रार्थ के दौरान सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में यह बात सामने आई कि बिना शंकराचार्य की पूर्वानुमति और उनके द्वारा दिए गए विधिवत मंत्र के कोई भी व्यक्ति संन्यासी नहीं बन सकता और न ही किसी को संन्यास दे सकता है। विद्वानों ने इसे सनातन परंपरा की मूल मर्यादा बताते हुए इसके पालन पर बल दिया।


चर्चा में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि वर्तमान समय में बिना विशेष योगदान के कुछ व्यक्तियों को संत घोषित किया जा रहा है, जिससे परंपरा की गरिमा प्रभावित हो रही है। कुंभ मेला जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में भागीदारी के लिए स्पष्ट पात्रता निर्धारित करने की आवश्यकता पर भी सहमति बनी।


इस अवसर पर देवभूमि विद्वत परिषद के गठन का निर्णय लिया गया तथा शंकराचार्य पद की नियुक्ति में मर्यादानुसार सिद्धांतों के पालन पर जोर दिया गया।
कार्यक्रम के अंत में स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने उपस्थित विद्वानों का पुष्पमालाओं एवं पटका पहनाकर सम्मान किया। शास्त्रार्थ में प्रो. मोहन चंद्र बलोदी, डॉ. भोला झा, प्रो. राधेश्याम चतुर्वेदी, डॉ. दिनेश चंद्र पाण्डेय, डॉ. पद्म प्रसाद सुवेदी, डॉ. श्रीप्रकाश भट्ट और डॉ. हरिगोपाल शास्त्री सहित कई विद्वान उपस्थित रहे।
इस आयोजन का उद्देश्य सनातन परंपराओं को सुदृढ़ करना तथा कुंभ आयोजन को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाना बताया गया।